जाने रसौली का गर्भावस्था पर क्या असर होता है

रसौली का गर्भावस्था पर असर

 

गर्भाशय की रसौली (यूट्रीन फॉइब्राएड) क्या होती हैं?
गर्भाशय की रसौली (यूट्रीन फॉइब्राएड) सामान्य ट्यूमर होते हैं, जो गर्भाशय (यूटरस) में बनते हैं और उन्हें हिस्टोरोमामा या फाइब्रोमास भी कहा जाता है।

ये केवल सामान्य मांसपेशियों और तंतु ऊतक (फाइब्रस टिशू) के संकलन होते हैं। यह गर्भाशय छिद्र (यूटरिन फिब्रोइड) के भीतर, गर्भाशय के बाहर या गर्भाशय की सीमाओं के अंदर बन सकते हैं।

आमतौर में, यह समस्या महिलाओं के बचपन में ही दिखाई दे जाती है। सामान्य रूप से, रसौली सामान्य रूप से होती हैं और इनके कोई भी लक्षण दिखाई नहीं देते हैं, अत: अक्सर ये लाइलाज ही रह जाती हैं।

 

रसौली मेरी गर्भावस्था (प्रेग्नेंसी) को किस तरह से प्रभावित करती है?
रसौली गर्भावस्था के दौरान बढ़ सकती हैं क्योंकि इनकी वृद्धि प्रोजेस्टेरोन और एस्ट्रोजन हॉर्मोन पर निर्भर करती है। कभी-कभी इनकी बढोतरी के कारण रसौली के बीच में दर्द हो सकता है।

ऐसी घटनाओं के दौरान मौखिक दर्द-निवारक (ओरल पेनकिलर) दवाईयां लेने की सलाह दी जा सकती है क्योंकि गर्भावस्था के दौरान गर्भाशय को किसी भी तरह के नुकसान से बचाने और भ्रूण (एंब्रियो) को विकसित करने के लिए रसौली को शल्यचिकित्सा (सर्जरी) से निकाला नहीं जा सकता है।

कभी-कभी थोड़ा योनि रस्राव (वेजाइनल ब्लीडिंग) हो सकता है, लेकिन ऐसा बहुत कम होता है कि यह अजन्मे बच्चे पर असर डाले। गर्भाशय में रसौली की वृद्धि पर नज़र रखने के लिए आप नियमित रूप से अल्ट्रासांउड करा सकती हैं क्योंकि कभी-कभी यह गर्भावस्था के दौरान सिकुड़ सकती है।

 

रसौली विकसित होते भ्रूण को किस तरह से प्रभावित करती है?
अगर रसौली गर्भानल (प्लेसेंटा) के पिछले हिस्से में है तो भ्रूण में ब्लड सप्लाई कम हो सकती है। यह बच्चे के विकास को नुकसान पहुंचा सकती है और यदि रक्त की आपूर्ति कम होती है तो इससे कम वजन के बच्चे का जन्म हो सकता है, जिसका कारण समयपूर्व प्रसव (अर्ली डिलीवरी) होता है। बढ़ती रसौली गर्भनाल की झिल्ली के टूटने के खतरे को बढ़ा सकती है, जो समयपूर्ण प्रसव का कारण बनती है।
 

क्या रसौली से गर्भावस्था में कोई खतरा हो सकता है?
कभी-कभी रसौली के कारण योनिक प्रसव (वैजाइनल डिलीवरी) नहीं हो पाता है। गर्भ में बच्चे की स्थिति रसौली की स्थिति पर निर्भर करती है क्योंकि इससे गर्भ में बच्चे की स्थिति उल्टी हो सकती है, जो प्रसव को मुश्किल बनाती है।

इसके अलावा, अगर रसौली गर्भाशय ग्रीवा (सर्विक्स) में होती है तो इससे योनि प्रसव में तकलीफ होने की ज्यादा संभावना होती है और अत: ये परिस्थितियां डॉक्टरों के लिए सी-सेक्शन कराना अनिवार्य बनाती हैं।

कभी-कभी सी-सेक्शन के दौरान रसौली को निकाल दिया जाता है, जिससे ज्यादा रक्तस्राव (ब्लीडिंग) होता है, ऐसी स्थिति में डॉक्टरों के लिए खून की कमी को रोकने के लिए एकमात्र विकल्प गर्भाशय को हटाना ही बचता है।