आईवीएफ को अपनाने से पहले, जाने लें इसके 3 प्रकार

क्या होता है आईवीएफ? (IVF In Hindi)

आईवीएफ का पूरा नाम इन विर्टो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) है। इसकी सहायता से संतान सुख से वंचित महिलाओं को मां बनने का सुख मिलता है।

आईवीएफ के प्रकार (Types of IVF in Hindi)

आईवीएफ प्रक्रिया से संतान सुख पाने के मुख्य रूप से तीन प्रकार होते हैं, जिसके अपने लाभ और जोखिम भी होते हैं, इन प्रकारों की जानकारी निम्नलिखित हैः

1. कन्वेंशनल आईवीएफ/ स्टिमुलेशन आईवीएफ-

यह आईवीएफ का सबसे अधिक उपयोग किेए जाने वाला इलाज है। इसमें महिला के मासिक धर्म को रोककर गर्भाशय को अधिक मात्रा में एग को बनने के लिए उत्तेजित किया जाता है।

फिर इन एग को रिट्रीवल करकर पुरूष के स्पर्म के साथ मिला दिया जाता है, ताकि इससे भ्रूण का निर्माण किया जा सके। 2 से 3 सर्वोत्तम भ्रूणों को इंप्लांटेशन के लिए चुना जाता है और बाकियों को जमा या नष्ट कर दिया जाता है।

  • लाभ और जोखिम

    चूंकि, इस प्रक्रिया में अंडाशय उत्तेजित हो जाते हैं इसलिए कई बार हाइपरस्टिम्यूलेशन के साइड इफेक्ट जैसे कई अंडों का बनना, जुड़वा या दो से अधिक बच्चों के होने की संभावना इत्यादि दिखाई देती हैं।

    एग रिट्रीवल के बाद आंतरिक रक्तस्राव हो सकता है, क्योंकि एक से अधिक एग को निकालने के लिए बड़ी सुई का उपयोग किया जाता है।

    इस प्रक्रिया में गर्भधारण की अधिक संभावना रहती है क्योंकि अधिक प्रत्यारोपण के लिए सर्वोत्तम भ्रूण का चयन किया जाता है।

2. नेचुरल साइकिल इन विर्टो फर्टिलाइजेशन-

इस प्रक्रिया में अंडाशय को अधिक अंडे बनाने के लिए उत्तेजित नहीं किया जाता है। अत: इसमें केवल एक एग का उपयोग किया जाता है, जो सामान्य मासिक धर्म चक्र का हिस्सा होता है।

इस एग को एकत्रित करके भ्रूण का निर्माण करने के लिए पुरूष के स्पर्म के साथ मिलाया जाता है, जिसे बाद में महिला के गर्भाशय में इंप्लांट किया जाता है।

  • लाभ और जोखिम

    चूंकि, इस प्रक्रिया में अंडाशय को उत्तेजित नहीं किया जाता है, इसलिए इसमें हाइपरस्टिमुलेशन होने का खतरा नहीं होता है।

    इस विधि को अत्याधिक लोगों द्वारा स्वीकार किया गया है क्योंकि इसमें अतिरिक्त भ्रूण का निर्माण नहीं किया जाता है।

    इस आईवीएफ प्रक्रिया का प्रमुख जोखिम यह होता है, कि इसकी सफलता दर अधिक नहीं होती है क्योंकि इसमें केवल एक भ्रूण को ही ट्रांसफर किया जाता है।

    इसके साथ में इसमें असफल एग रिट्रीवल भी हो सकता है, जिसके कारण इसके असफल होने की अधिक संभावना होती है।

    यह आईवीएफ उन महिलाओं के लिए सबसे अच्छी होती है, जिनका एफएसएच स्तर अधिक होता है और इसके साथ में जिनमें आईवीएफ के दौरान कम गुणवत्ता के भ्रूण का निर्माण होता है।

 

3. मिल्ड स्टिमुलेशन इन विर्टों फर्टिलाइजेशन-

इस आईवीएफ को इन विट्रो फर्टिलाइजेशन  के समान ही किया जाता है, लेकिन इसमें केवल यही अंतर होता है कि इसमें थोड़े समय के लिए हॉर्मोन की दवाई को दिया जाता है ताकि इससे अंडाशय में अधिक अंडे बन सकें।

इसमें मासिक धर्म चक्र को रोकने की प्रक्रिया को नहीं किया जाता।

 

  • लाभ और जोखिम:

    यह प्रक्रिया उन महिलाओं में ओवेरियन हाइपरस्टीमुलेशन सिंड्रोम के खतरे को कम करती है, जो पहले आईवीएफ चक्रों से गुजर चुकी हैं या जो पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (पीसीओएस) से पीड़ित होती हैं।

    इस प्रक्रिया का मुख्य जोखिम यह होता है कि इसमें रिट्रीवल में कम अंडों की आवश्यकता होती है अत: इसमें कम भ्रूणों को ट्रांसफर किया जाता है।

    चूंकि, इसमें अंडाशय को उत्तेजित नहीें किया जाता है तो जल्द ही अगले चक्र को दोहराया जा सकता है। छह महीनों के अंतर्गत लगभग तीन से चार चक्रों को दोहराया जा सकता है।

    इस प्रक्रिया की सफलता दर आईवीएफ के समान ही होती है।
    यह प्रक्रिया मुख्य रूप से उन महिलाओं के लिए अच्छा विकल्प होता है, जो अत्याधिक हॉर्मोनल दवाईयों के साथ-साथ अधिक अंडों को उत्पन्न करने में असमर्थ होती हैं।
    इसके साथ में जिन महिलाओं के अंडों की गुणवत्ता पिछले चक्रों में खराब होती है, उन्हें इस प्रक्रिया से लाभ पहुंच सकता है।

जैसा कि हम सभी यह जानते हैं कि इन दिनों आईवीएफ प्रक्रिया काफी लोकप्रिय हो रही है। इसकी सहायता से बहुत सारे दंपत्तियों को संतान सुख मिल रहा है।

इसके बावजूद बहुत सारे लोगों को आईवीएफ की संपूर्ण जानकारी न होने के कारण वे इसका पूर्ण लाभ नहीं उठा पाते हैं। अत: हमने इस लेख में आईवीएफ के प्रमुख प्रकारों और उनके लाभ और जोखिमों की जानकारी देने की कोशिश की है।

इसलिए हमे यह उम्मीद है कि यह लेख आपके लिए उपयोगी साबित होगा।

अगर आप या आपकी जान-पहचान में कोई ऐसे दंपत्ति हैं, जो संतान सुख से वंचित हैं। तो वह आईवीएफ को अपना कर संतान सुख को प्राप्त कर सकते हैं।

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